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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 43
श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ । ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥
हे मां! तेरे चरण जो श्रुतियों की मुर्धा पर शिखरवत् रखे हैं, दया करके उनको मेरे शिर भी रख दे, जिनका चरणोदक शंकर की जटाजूट से निकली हुई गंगा है और जिनके तलवों में लगी लाक्षा की कान्ति हरि के चूडा में (केशों में) धारण की हुई अरुण मणि की कान्ति के सदृश है।
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