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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 42
पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत । यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली- नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ॥
(जंघाओं का ध्यान) हे गिरि सुते! तेरी दोनों पिंडलियां रुद्र को जीतने के लिये दुगुने बाणों से भरे कामदेव के दो तरकसों के समान हैं। जिनके अग्रफल पैरों की १० अंगुलियों के नखों के अग्र भाग के रूप में दस दिख रहे हैं, जो देवताओं के मुकुट रुपी सान पर पहनाए गये है।
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