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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 41
करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली- मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती । सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते विधिज्ञ्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ॥
(उरुयुग्म का ध्यान) हे गिरि सुते! आप अपने दोनों उरुओं मे गजेन्द्रों के मुंडों को और सुवर्ण के बने हुए केले के लंबे स्थंबों को जीतकर, पति को प्रणाम करते २ कठिन हो गये हैं ऐसे दोनों सुन्दरगोल घुटनो से बुद्धिमान हाथी के दोनों (मस्तक के) कुंभों को भी पराजित कर रही हैं।
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