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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 4
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् । दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ॥
(अलकों का ध्यान) स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का परिहास करता है । जिनमें स्फटिक सदृश शोना वाले दन्तों में किंचित् मुस्कराते समय निकलने वाली सुगंध पर काम के दहन करने वाले शिवजी के नेत्र रूपी भौंरे भोर मस्त हो जाते हैं।
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