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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 39
कुचौ सद्यःस्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता । तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ॥
हे देवि! कांखों की रगड़ से झट २ पसीना आने के कारण जिनके किनारे पर से अंगिया फट गई है सुवर्ण कलश की आभायुक्त तेरे कुच द्वय के हिलने से टूटने से बचाने के लिये अलम् अर्थात् पर्याप्त हैं इतना मात्र जुडा हुआ तेरा (कटि प्रदेश) मानो काम देव ने लवली वल्लि (एक प्रकार की बेल) से वलियों से तीन बार बांध रखा है।
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