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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 38
निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव । चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥
हे शैल तनये! तेरे मध्य भाग की सम अवस्था चिर कुशल रहे, जो स्वाभाविक ही क्षीण है और स्तन रूपी तट के भार से क्लान्त होने के कारण झुकी हुई तेरी मूर्ति के नाभि देश पर पड़ने वाली वलियों पर शनैः २ नदी के तट के वृक्ष के सदृश टूटता सा प्रतीत होता है।
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