हे गिरि सुते! तेरी नाभि की जय है। उसकी उपमा नीचे दिये हुए किसी भी प्रकार से दी जा सकती है । (१) गंगा का स्थिर भंवर, (२) तेरे स्तन रूपी विकसित पुष्पों को धारण करने वाली रोमावलि रूपी लता के उगने का गमला, (३) काम देव के तेज रूपी अग्नि को धारण करने वाला हवन कुंड ( ४ ) रति का क्रीडा स्थल, अथवा (५) गिरीश शंकर के नयनों को सिद्धि प्राप्त करने के लिये तप करने की गुफा का द्वार।
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