हे शिवे, हे जननि! यह जो यमुना की बहुत पतली तरंग के सदृश आकृति वाली (रोमावलि) तेरे कृश कटि भाग में किंचित दिख रही है, वह सदबुद्धि वाले मनुष्यों को ऐसी जान पड़ती है, मानो तेरे कुच कलशों के बीच एक दूसरे की रगड़ से पिस २ कर पतला होने पर आकाश तेरी नाभि के बिल में अथवा नाभि में सर्पिणी की तरह प्रवेश कर रहा है।
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