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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 35
हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः । समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥
(नाभि का ध्यान) हे अचल तनये ! हर के क्रोध की ज्वालाओं से लिपटे हुए शरीर से कामदेव ने गहरे सरोवर सदृश तेरी नाभि में जब गोता लगाया, उनमे लता सदृश उठने वाले धूवे की जो रेखा बनी, उसे जन साधारण, हे जननि! तेरी नाभी के ऊपर उठने वाली रोमावलि समझते हैं।
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