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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 34
तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव । दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत् कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥
हे धरणिधर कन्ये! मैं ऐसा समझता हूं कि तेरे स्तनों के दूध का पारावार तेरे हृदय से बहने वाला सारस्वत ज्ञान सदृश है। जिसे पीकर, दयावती होकर तेरे स्तनपान कराने पर द्रविडशिशु ने प्रौढकवियों के सदृश कमनीय कविता की रचना की थी।
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