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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 33
वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् । कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥
हे मां! तेरा कुचभाग (छाती का भाग) जो गजासुर के मस्तक रूपी कुंभ से निकली हुई मुक्तामणियों की विमल माला पहने हुए है, उस पर तेरे बिंबसदृश लाल होठों की कान्ति पड़ने से अरुण छाया दिखती है, इसलिये वह हार शिवजी की प्रताप-मिश्रित-कीर्ति का प्रतीकवत् है।
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