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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 32
अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः । पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसङ्गरसिकौ कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥
हे हिमाचल पर्वतराज की पताका सदृश्य पुत्रि! अमृत रस से भरे माणिक्य के बने कुप्पों अथवा कलशों के सदृश तेरे स्तनों को देखकर हमारे मन में संदेह का स्पन्द भी नहीं होता (जैसा कि स्त्रियों के स्तनों से होना संभव है ) क्योंकि (उनका ऐसा प्रभाव है कि ) उनके दुग्ध पान करने से गणेशजी और स्कन्द दोनों आज भी कुमार ही हैं और उनको स्त्री संगम का रस विदित नहीं है।
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