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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 31
समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् । यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झडिति ॥
(दोनों स्तनों का ध्यान) हे देवि! स्कन्द और गणेशजी के पान किये हुए तेरे दोनों स्तन, जिनके मुख से दूध टपक रहा है, सदा हमारे खेद का हरण करें, पीते समय जिन स्तनों को देखकर गणेशजी शंका से आकुलित हृदय होकर झट अपने ही सिर के कुंभवत् भागों को टटोलकर हास्यजनक चेष्टा करते हैं।
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