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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 3
तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी- परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः । वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर- द्विषां बृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ॥
(मुख का ध्यान) तेरे मुख की सौन्दर्य लहरी के प्रवाहस्रोत के मार्ग के सदृश सिन्दूर से भरी तेरे केशों की मांग हमारे क्षेम (कल्याण) का प्रसार करे, जो मांग केशों के भारमय अन्धकार रूपी प्रबल दुष्मनों के वृन्दों से बन्दी की हुई उदय होने वाले नवीन सूर्य की अरुण किरण के सदृश हैं।
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