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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 29
मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः । नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो- श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥
(चारों भुजाओं का ध्यान) शिवजी के नखों के द्वारा पहिले पुराकाल में कभी (पांचवा शिर) मथन किया जाने की स्मृति से संत्रस्त होकर, चारों शिरों की एक समान रक्षा के लिये, तेरे अभयदान देने वाले हाथ की शरण में समर्पण बुद्धि रखकर, मृणाली सदृश कोमल तेरी चारों लता जैसी भुजाओं के सौंदर्य की, ब्रह्मा चारों मुखों मे स्तुति किया करते हैं।
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