(चारों भुजाओं का ध्यान)
शिवजी के नखों के द्वारा पहिले पुराकाल में कभी (पांचवा शिर) मथन किया जाने की स्मृति से संत्रस्त होकर, चारों शिरों की एक समान रक्षा के लिये, तेरे अभयदान देने वाले हाथ की शरण में समर्पण बुद्धि रखकर, मृणाली सदृश कोमल तेरी चारों लता जैसी भुजाओं के सौंदर्य की, ब्रह्मा चारों मुखों मे स्तुति किया करते हैं।
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