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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 27
भुजाश्लेषान् नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् । स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ॥
(ग्रीवा का ध्यान) तेरी ग्रीवा जो पुरारि की भुजा के नित्य स्पर्श से खरदरी हो रही है, तेरे मुखकमल को धारण करती हुई कमलनाल ( मृणाली) जैसी सुन्दर लगती है, जो स्वतः तो गौर वर्ण है परन्तु अधिक समय तक अगर के गाढे लेप से कीचड़ में सनी हुई सी मलीन दिखती है और जिसके नीचे हार पहना हुआ है।
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