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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 26
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया । करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥
(चिबुक का ध्यान) हे गिरीसुते ! उपमारहित तेरी चिबुक (ठोडी) का वर्णन हम कैसे करें ? जिसे हिमाचल ने अर्थात् तेरे पिता ने वात्सल्य प्रेम से अपनी अंगुलियों से स्पर्श किया है और गिरीश ने अधरपान करने की आकुलता से बार २ उठाया है और जो उस समय ऐसी प्रतीत होती है मानों वह शंभु के हाथ में मुख देखने के लिये उठाए हुए दर्पण का दस्ता हो।
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