मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 25
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने । तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥
(वाणी की प्रशंसा) पशुपति के विविध अपदानों को वीणा पर गाते समय, तेरे शिर हिलाकर मरस्वती की श्लाघा के वचन कहना आरंभ करने पर, जो अपनी मधुरता से वीणा के कलरव को फीका करते हैं, सरस्वती अपने वीणा को कपडे में लपेट कर रख देती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सौन्दर्यलहरी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सौन्दर्यलहरी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें