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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 24
रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर्- निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः । विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ॥
हे मां! दैत्यों को रण में जीतकर अपहृत शिरस्त्र और कवचों को उतारकर, शिवजी के निर्माल्य से विमुख जो चंड का भाग होता है, स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र तीनों तेरे मुख के पान के पास को, जिसमें चन्द्रमा जैसे स्वच्छ कपूर के टुकडे पडे हैं, ग्रहण करते हैं।
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