(मुस्कान का ध्यान)
तेरे चन्द्रवदन की मुस्कान रूपी ज्योत्स्ना (चांदनी) की प्रचुरता को पीकर, अति मधुर होने के कारण चकोरों की चंचु अति रसास्वाद से जड हो गई है अर्थात् हट गई है। इसलिये वे खट्टे रस के इच्छुक चन्द्रमा के अमृत की लहरी को कांजी सदृश समझ कर प्रतिरात्रि खूब स्वच्छन्द पीते रहते हैं।
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