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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 22
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा । अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ॥
(मुस्कान का ध्यान) तेरे चन्द्रवदन की मुस्कान रूपी ज्योत्स्ना (चांदनी) की प्रचुरता को पीकर, अति मधुर होने के कारण चकोरों की चंचु अति रसास्वाद से जड हो गई है अर्थात् हट गई है। इसलिये वे खट्टे रस के इच्छुक चन्द्रमा के अमृत की लहरी को कांजी सदृश समझ कर प्रतिरात्रि खूब स्वच्छन्द पीते रहते हैं।
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