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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 21
प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता । न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ॥
(ओष्टों का ध्यान) हे सुन्दर दातों वाली भगवति ! स्वाभाविक लाल रंग के तेरे होठों की शोभा का सादृश्य करने वाले पदार्थों के नाम कहता हूं। मूंगे की लता में यदि फल आ जाय, (तो उतने सुन्दर कहे जा सके हैं), परन्तु बिंब फल तो नहीं, क्योंकि उनकी अरुणिमा तो तेरे विम्ब की प्रतिबिंबित् अरुणिमा की झलक सदृश है, यदि उनमे किसी प्रकार तेरे होठों की तुलना भी की जाय, तो वे तेरे होठों की सुन्दरता की एक कला के बराबर भी सुन्दर न उतरने से क्या लज्जित नहीं होते ?
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