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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 20
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् । वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥
(नाशिका का ध्यान) हे तुहिन गिरि अर्थात् हिमाचल के वंश की ध्वजा की पताके । तेरे नाक का यह बांस हमको शीघ्र उचित फल का देने वाला हो । अथवा उस पर हमारे लिये उचित फल लगें । क्योंकि उसके भीतर तेरे अति शीतल निश्वासों से मोती बन रहे हैं, और उनकी बायें नथने में इतनी समृद्धि है कि एक मुक्तामणि बाहर भी दिखा रहा है। यहां नथ के मोती से अभिप्राय है जो बांये नाक में पहनी जाती है।
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