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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 19
सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् । चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥
हे शर्वाणि ! सरस्वती की सुन्दर युक्ति को जो अमृत की लहरी के कौशल को हरती है श्रवण रूपी चुल्लुओं द्वारा अविरल पान करते समय तेरे कुंडलगण चमत्कार पूर्ण उक्तियों की श्लाधा सूचक सिर हिलाते समय, झण २ बजकर मानों ॐकार का उच्चारण सदृश हुँकार द्वारा उत्तर दे रहे हैं।
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