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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 18
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् । यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥
(मुख का ध्यान) तेरे चमकते हुए कपोलों पर प्रतिबिंबित दोनों कर्णफूलों युक्त तेरा मुख मुझे चार पहियों वाला कामदेव का रथ जंचता है, जिस पर चढ़कर अथवा जिसका आश्रय लेकर महावीर कामदेव, सूर्य और चन्द्रमा दो पहियों वाले पृथिवी रूपी रथ पर युद्धार्थ सुज्जित शंकर के विरुद्ध अड़ा है।
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