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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 17
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदण्डकुतुकम् । तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस- न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥
(कनपटियों का ध्यान) हे पर्वत राज की पुत्रि तेरी दोनों वक्र कनपटियां किसकी बुद्धि में पुष्पवाण धारण करने वाले धनुष के कोणों का कौतुहल न करेंगी। जहां श्रवणपथ का उल्लंघन करके तेरा तिरछा कटाक्ष कनपटि को लांघकर कान तक पहुंचा हुआ बाण सदृश दिखता है, जो दोनों भौंहों के धनुष पर चढ़ा हुआ है, कनपटियां धनुष के कोण हैं। भगवती की त्योरी रूपी धनुष पर चढे हुए कटाक्ष रूपी बाण से समस्त बाधाओं का नाश होता है।
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