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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 16
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे । अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥
हे शिव! किंचित विकसित् नीलोत्पल की शोभा से युक्त दूर तक पहुंचने वाली अपनी दृष्टि से कृपया दूर स्थित मुझ दीन को भी स्नान करा दे । उससे यह धन्य हो जायगा और ऐसा करने से तेरी कोई हानि नहीं हैं, क्योंकि चन्द्रमा की किरणें वन में और महलों में समान रूप से पड़ती हैं।
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