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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 15
तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः । इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम् जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥
हे अपर्णे ! निमेष रहित मछलियां तो सदा पानी में छुपी रहती हैं, उनको यह भय रहता है कि कहीं तेरी आंखें ईर्ष्या वश उनकी चुगली तेरे कानों से न कर दें और यह लक्ष्मी सवेरा होने पर कपाटों के सदृश बंद हो जाने वाले दलयुक्त कुमुदिनी को छोड़ जाती है और रात्रि को उन्हें खोल कर प्रवेश करती है।
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