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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 14
निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये । त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥
हे धरणिधर राजन्य हिमाचल की पुत्री ! सन्तों का कहना है कि तेरे निमेष (नेत्र बंद करने) से जगत् का प्रलय और उन्मेष अर्थात् नेत्र खोलने से उद्भव अर्थात् सृष्टि होती है । यह सारा जगत् प्रलय के पश्चात् तेरे उन्मेष से उत्पन्न हुआ है, उसकी रक्षा करने के लिये ही मुझे शंका होती है, कि तेरी आंखों ने झपकना बंद कर रखा है।
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