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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 13
पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः । नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमनघम् ॥
पशुपति शंकर भगवान की पराधीनता में हृदय समर्पण करने वाली हे भगवती ! अरुण, शुक्ल, और श्याम वर्णों की शोभा से युक्त दयापूर्ण अपने नेत्रों से सोणनदी, गंगा और सूर्यतनया ( जमुना ) इन तीनों तीर्थों के सदृश निश्चय ही हम लोगों को पवित्र करने के लिये तू पवित्र संगम बना रही है।
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