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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 12
विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते । पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान् रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ॥
हे ईशान की दयिते ! ये तेरे तीनों नेत्र तीन रंग का अंजन लगाने से मानों पृथक २ तीन रंग के चमक रहे हैं और महा प्रलय के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को जो प्रलय काल में उपरत हो गये थे, फिर पैदा करने के लिये रज, सत्व और तम तीनों गुणों को धारण किये हुए से प्रतीत होते हैं।
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