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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 11
गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले । इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥
हे पर्वतराज के कुल की प्रमुख कली ! ये तेरे बाणों सदृश दोनों नेत्र कानों तक पहुंचे हुए हैं, जो पंखों के स्थान पर पलकें धारण किए हुए हैं और पुरारि के चित्त की शान्ति का भंग करने वाले फल से युक्त है, कान तक ताने हुए वे कामदेव के बाणों का कार्य कर रहे हैं।
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