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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 2 • श्लोक 1
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः । स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥
(मुकुट का ध्यान) हे हिमाचल की पुत्रि! जो मनुष्य तेरे सुवर्ण के बने हुए किरीट का वर्णन करे तो उसकी धारणा ऐसी क्यों न होगी, कि मानो इन्द्र धनुष निकला हुआ है। क्योंकि वह किरीट गगन मणियों अर्थात् तारागण रूपी मणियों से घनीभूत जड़ा हुआ है और चन्द्रमा के टुकडे का पक्षि के घोंसले सदृश जान पड़ता है और जो उपः कालीन प्रकाश में रंगबिरंगा चमक रहा है।
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