जब उस परावर ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है, तब हृदय की गाँठ (अज्ञान का बन्धन) टूट जाती है, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं और उसके समस्त कर्म (बंधनरूप संस्कार) क्षीण हो जाते हैं।
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