इन समाधियों के द्वारा साधक को निरन्तर अभ्यास करते हुए समय व्यतीत करना चाहिए; जब देहाभिमान (शरीर का अहंभाव) गल जाता है और परमात्मा का यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब मन जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे परम अमृत (आनन्दस्वरूप ब्रह्म) का ही अनुभव होता है।
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