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सरस्वती रहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 29
समाधिराद्यसन्मात्रान्नामरूपपृथक्कृतिः । स्तब्धीभावो रसास्वादात्तृतीयः पूर्ववन्मतः ॥
प्रथम प्रकार की समाधि में केवल सत्-मात्र का अनुभव होता है, जिसमें नाम और रूप का पृथक्करण कर दिया जाता है। तीसरी अवस्था रसास्वादजनित स्तब्धभाव (आनन्दानुभूति से उत्पन्न निश्चलता) की होती है, और उसे भी पूर्ववत् ही समझना चाहिए।
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