समाधि का प्रथम स्वरूप केवल शुद्ध ‘सत्’ (अस्तित्व) में स्थित होकर नाम और रूप से पृथक् होना है; दूसरा स्वरूप उस स्थिति में पूर्ण स्थिरता (स्तब्धता) का अनुभव करना है; और तीसरा स्वरूप उस परम रस (आनन्द) का आस्वादन करना है—ये तीनों अवस्थाएँ पूर्व वर्णन के अनुसार मानी गई हैं।
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