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सरस्वती रहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 25
समाधिं सर्वदा कुर्याधृदये वाथ वा बहिः । सविकल्पो निर्विकल्पः समाधिर्द्विविधो हृदि ॥
मनुष्य को चाहिए कि वह सदैव समाधि का अभ्यास करे, चाहे हृदय में अथवा बाह्य विषयों मेंहृदयस्थ समाधि दो प्रकार की कही गई है— सविकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि
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