साधक को चाहिए कि वह सदा हृदय में अथवा बाह्य (जगत् में) भी समाधि का अभ्यास करे; यह समाधि हृदय में दो प्रकार की होती है—सविकल्प (विचार सहित) और निर्विकल्प (विचार रहित)।
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