भेदस्तयोर्विकारः स्यात्सर्गे न ब्रह्मणि कचित् । अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ॥
उन दोनों (ब्रह्म और सृष्टि) में जो भेद दिखाई देता है, वह केवल सृष्टि के विकार (परिवर्तन) में है, ब्रह्म में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता; तथा ‘अस्ति’ (सत्ता), ‘भाति’ (प्रकाश), ‘प्रिय’ (आनन्द), ‘रूप’ और ‘नाम’—ये पाँच अंश (तत्त्व) माने गए हैं।
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