या शक्तिस्त्वद्वशाद्वह्म विकृतत्वेन भासते । अत्राप्यावृतिनाशेन विभाति ब्रह्मसर्गयोः ॥
जो शक्ति तेरे (माया के) अधीन होकर ब्रह्म को विकृत (परिवर्तित) रूप में प्रकट करती है, उसी में भी जब यह आवरण (अज्ञान) नष्ट हो जाता है, तब ब्रह्म और सृष्टि का यथार्थ स्वरूप स्पष्ट रूप से प्रकाशित हो उठता है।
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