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सरस्वती रहस्य • अध्याय 1 • श्लोक 21
आवृतौ तु विनष्टायां भेदे भातेऽपयाति तत् । तथा सर्गब्रह्मणोश्च भेदमावृत्य तिष्ठति ॥
जब आवरणशक्ति का नाश हो जाता है, तब जो भेद का आभास प्रतीत हो रहा था, वह भी समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार यह आवरणशक्ति ब्रह्म और सृष्टि के भेद को आच्छादित करके स्थित रहती है।
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