विक्षेपशक्ति लिङ्गशरीर आदि से लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तक इस जगत की रचना करती है; और भीतर (अन्तः) द्रष्टा और दृश्य के बीच भेद उत्पन्न करती है तथा बाहर (बहिः) भी ब्रह्म से भिन्न सृष्टि का विस्तार प्रकट करती है।
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