सात्विकत्वात्समष्टित्वात्साक्षित्वाज्जगतामपि । जगत्कर्तुमकर्तुं वा चान्यथा कर्तुमीशते ॥
सत्त्वप्रधान होने के कारण, समष्टि स्वरूप होने के कारण, तथा समस्त जगत् के साक्षी होने के कारण, वह ईश्वरजगत् की रचना करने, न करने अथवा अन्य प्रकार से करने में समर्थ है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सरस्वती रहस्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
सरस्वती रहस्य के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।