तेन चित्प्रतिविम्बेन त्रिविधा भाति सा पुनः । प्रकृत्यवच्छिन्नळ्या पुरुषत्वं पुनश्च ते ॥
उस चैतन्य के प्रतिबिम्ब के कारण वही प्रकृति पुनः तीन प्रकार से प्रकट होती है।
और प्रकृति से अवच्छिन्न(उपाधि द्वारा सीमित प्रतीत होने वाले) उस चैतन्य को पुरुष कहा जाता है।
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