उसके पश्चात् सत्त्व आदि गुणों की साम्यावस्था से प्रकृति की उत्पत्ति होती है; और उसी में सत्य (ब्रह्म) चैतन्य की छाया के रूप में ऐसे प्रकट होता है, जैसे दर्पण में किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।
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