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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 9
अस्त्यसौ विषयोऽचिन्त्यः शक्यः प्राप्तुं स मादृशैः । प्राप्त एवंगुणश्चासाविति श्रद्धाधिमुक्तितः ॥
यह अचिन्त्य विषय है, परन्तु श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति यह मानता है कि इसे प्राप्त किया जा सकता है और इसी विश्वास से आगे बढ़ता है।
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