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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 4
यः शीलं तनुवाङ्मनोभिरमलं रक्षेदनाभोगवद्धीमान् बोधिमनुत्तरामभिलषन् कल्पाननेकानपि । यश्चान्यः शृणुयादितः पदमपि श्रुत्वाधिमुच्येदयं तस्माच्छीलमयाच्छुभाद्बहुतरं पुण्यं समासादयेत् ॥
जो बुद्धिमान व्यक्ति अनेक कल्पों तक शरीर, वाणी और मन से शुद्ध आचरण का पालन करे, उससे भी अधिक पुण्य उस व्यक्ति को मिलता है जो इस धर्म का एक पद सुनकर श्रद्धा करता है।
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