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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 3
यो दद्यान्मणिसंस्कृतानि कनकक्षेत्राणि बोध्यर्थिको बुद्धक्षेत्ररजःसमान्यहरहो धर्मेश्वरेभ्यः सदा । यश्चान्यः शृणुयादितः पदमपि श्रुत्वाधिमुच्येदयं तस्माद्दानमयाच्छुभाद्बहुतरं पुण्यं समासादयेत् ॥
जो व्यक्ति बुद्धों को प्रतिदिन रत्नों से सुसज्जित स्वर्णभूमि के समान दान दे, उससे भी अधिक पुण्य उस व्यक्ति को मिलता है जो इस धर्म का एक पद सुनकर श्रद्धा करता है।
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