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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 24
योऽभीक्ष्णं प्रतिसेव्यः पापसुहृदः स्याद्बुद्धदुष्टाशयो मातापित्ररिहद्वधाचरणकृत् संघाग्रभेत्ता नरः । स्यात्तस्यापि ततो विमुक्तिरचिरं धर्मार्थनिध्यानतो धर्मे यस्य तु मानसं प्रतिहतं तस्मै विमुक्तिः कुतः ॥
जो व्यक्ति बार-बार पापमित्रों का साथ करे, माता-पिता की हत्या करे या संघ को तोड़े, वह भी यदि धर्म के अर्थ पर मनन करे तो मुक्त हो सकता है; परन्तु जिसका मन धर्म के प्रति विरोधी है, उसके लिए मुक्ति कैसे संभव है।
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