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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 23
नाग्नेनोंग्रविषादहेर्न वधघकान्नैवाशनिभ्यस्तथा भेतव्यं विदुषामतीव तु यथा गम्भीरधर्मक्षतेः । कुर्युर्जीवितविप्रयोगमनलव्यालारिवज्राग्नयस्तद्धेतोर्न पुनर्ब्रजेदतिभयामावीचिकानां गतिम् ॥
अग्नि, विषधर सर्प, हत्यारे या वज्र से उतना भय नहीं होना चाहिए जितना गम्भीर धर्म के अपमान से होना चाहिए; क्योंकि वे केवल जीवन का नाश कर सकते हैं, परन्तु धर्म का अपमान अत्यन्त भयंकर दुर्गति का कारण बन सकता है।
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