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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 22
धीमान् द्यादधिमुक्तिशुक्लविरहान्मिथ्याभिमानाश्रयात् सद्धर्मव्यसनावृतात्मकतया नेयार्थतत्त्वग्रहात् । लोभग्रेधतया च दर्शनवशाद्धर्मद्विषां सेवनादाराद्धर्मभृतां च हीनरुचयो धर्मान् क्षिपन्त्यर्हताम् ॥
कुछ लोग श्रद्धा के अभाव, मिथ्या अभिमान, सद्धर्म से विरक्ति, अर्थ के भ्रमित ग्रहण और लोभ के कारण धर्म से विमुख होकर आर्यों के उपदेशों को अस्वीकार कर देते हैं।
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