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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 5 • श्लोक 21
आर्यांश्चापवदन्ति तन्निगदितं धर्मं च गर्हन्ति यत् सर्वः सोऽभिनिवेशदर्शनकृतः क्लेशो विमूढात्मनाम् । तस्मान्नाभिनिवेशदृष्टिमलिने तस्मिन्निवेश्यामतिः शुद्धं वस्त्रमुपैति रङ्गविकृतिं न स्नेहपङ्काङ्कितम् ॥
जो लोग आर्यों की निन्दा करते हैं और उनके उपदेशित धर्म को दोष देते हैं, उनका यह आचरण मिथ्या-दृष्टि से उत्पन्न क्लेश है; इसलिए जिस मन में आसक्ति की मलिनता हो उसमें धर्म को स्थापित नहीं करना चाहिए, जैसे कीचड़ लगे वस्त्र पर रंग नहीं चढ़ता।
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